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भगवान विष्णु को सुदर्शन चक्र कैसे प्राप्त हुआ था (How did Lord Vishnu get the Sudarshana Chakra)

भगवान विष्णु को सुदर्शन चक्र कैसे प्राप्त हुआ था (How did Lord Vishnu get the Sudarshana Chakra)

पूर्वकाल में एक समय दैत्य (Devil) बहुत ज्यादा बलवान हो गए थे, वे लोगों को पीड़ित करने लगे थे जिससे  धर्म का लोप होने लगा था।  सारे देवता भगवान विष्णु की शरण में गए और तब भगवान विष्णु ने उन्हें आश्वत करते हुए  कहा कि वे  दैत्यों पर विजय पाने के लिए महामृत्युंजय महादेव शिव जी की आराधना कर देवताओं के कार्य को सम्पन्न करेंगे।
उसके बाद भगवान विष्णु ने कैलाश पर्वत (Kailash) के समीप जाकर, वहां एक कुंड में अग्नि को स्थापित किया और पार्थिव विधि के अनुसार अनेक प्रकार के मंत्रों और स्त्रोतों द्वारा - मानसरोवर में उत्पन्न कमलों से प्रसन्नतापूर्वक शिव जी का पूजन करते रहे । फिर भगवान विष्णु ने शिव जी के सहस्त्र नामो  में  से - एक एक नाम - मंत्र का उच्चारण  कर शिव जी को एक एक कमल अर्पित करते हुए उन शरणागत वत्सल शंभु  की पूजा प्रारम्भ की ।
 उस समय लीलाधारी शिव जी ने विष्णु की भक्ति की परीक्षा लेने के लिए अपनी माया से  उन सहस्त्र (हजार) कमलों में से एक कमल का अपहरण कर लिया । पूजा करते समय जब एक अंतिम सहस्त्र नाम मंत्र के साथ चढ़ाने को कमल कम पड़ गया तब श्री विष्णु जी ने कमल के स्थान पर अपना एक नेत्र को ही निकाल कर  चढ़ा दिया । यह देखकर सभी प्रकार के दुखों को हरने वाले शंकर जी  श्री विष्णु पर प्रसन्न होकर वहां प्रकट हो गए।

भगवान विष्णु को सुदर्शन चक्र कैसे प्राप्त हुआ था (How did Lord Vishnu get the Sudarshana Chakra)

तब श्री विष्णु जी ने शिव जी से निवेदन किया कि इस समय दैत्यों के अत्याचारों से  सारा संसार पीड़ित है और उनके कोई भी आयुध दैत्यों को मारने में समर्थ नही हो पा रहे है  इसलिए वे उनकी शरण मे आये है । श्री विष्णु जी का यह वचन सुनकर देवाधिदेव महेश्वर ने विष्णु जी को अपना महातेजस्वी "सुदर्शन चक्र" प्रदान किया।
तब भगवान विष्णु ने उस सुदर्शन चक्र से बिना परिश्रम के शीघ्र ही उन महाबली राक्षसों का अंत कर दिया । इस प्रकार संसार मे  शांति स्थापित हुई और देवता सुखी हुए।

कोटिरुद्र संहिता अध्याय 35 में  श्री भगवान विष्णु द्वारा जप किये गए "श्री शिव सहस्त्र नाम स्त्रोत" के हजार नामों का अर्थों सहित विस्तृत रूप से  वर्णन है । 
पुरातन काल से विविध देवता, ऋषिगण तथा राजा लोग, सर्वकामनाओं की सिद्धि के लिए भगवान माहेश्वर की आराधना करते चले आये है ।  उन सभी ऋषियों, देवताओं और राजाओं का संक्षिप्त  में वर्णन कोटिरुद्र संहिता अध्याय 37 में है ।

तदनन्तर ऋषियीं ने श्री सूत जी से पूछा "किस व्रत के करने से शिव  जी संतुष्ट होकर उत्तम सुख प्रदान करते है ? तथा शिव भक्तों  को  भोग तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है ?
 श्री सूत जी ने उत्तम दस व्रतों का विधिपूर्वक अध्याय 38 और 39  में वर्णन किया है । श्री सूत जी ने  सिद्धि प्राप्त करने के लिए चौदह वर्षों तक  सबसे प्रमुख व्रत  मासिक शिवरात्रि  को ही बताया है । फिर इसका उद्यापन भी करना चाहिए । महाशिवरात्रि पर व्रत रखने, शिवार्चन  करने, प्रत्येक प्रहर की पूजा करने, रात्रि में जागरण करन , विधिपूर्वक पूजा करने से शिव जी जल्द ही प्रसन्न होते है।

भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र में एक हजार आरी होती हैं । यह चक्र श्री विष्णु जी को भगवान शंकर से उनके शिव सहस्त्र नाम मे स्त्रोत की आराधना करने पर मिला था अर्थात सुदर्शन चक्र की हर एक आरी में शिव जी के एक नाम की शक्ति है, और सुदर्शन चक्र, शिव सहस्त्र नामो (हजार नामों) की सम्मिलित महाशक्ति से ही कार्य करता है।

शिव भक्तों के लिए शिव सहस्त्र नाम ((हजार नाम) ) ही अदृश्य सुदर्शन चक्र है जो निरन्तर उनकी रक्षा करता रहता है।

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